नवद्वारम पुरम गत्वा सततं नियतो वशी
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च
तमेवाहुरणुभ्योंअणुम तं महाद्भूयो महत्तरम
बहुधा सर्वभूतानि व्याज्य तिष्ठति शाश्वतं
क्षेत्रज्ञमेकत: कृत्वा सर्वे क्षेत्रमथैकत:
एवं संविमृशोज्ञIनि संयत: सततं हृदि
******************************************** ” नौ द्वार वाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियम पूर्वक निवास करता हैं….!. सब को वश में रखता हैं….!. सम्पूर्ण कोकों में चराचर प्राणियों का शासन करनेवाला ईश्वर भी वाही हैं ….!. उसे अणु से भी अणु और महान से भी महान कहते हैं…..!. वह नाना प्रकार के सभी प्राणियों को व्याप्त करके सदा स्थित रहता हैं….!. क्षेत्रज्ञ को एक ऑर करके दूसरी ऑर सम्पूर्ण क्षेत्र को पृथक करके रखे हैं….!. संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञiनि पुरुष सदा इस प्रकार अपने ह्रदय में विचार करता रहे - जड़ ऑर चेतन की पृथकता का विवेचन किया करे…..!
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च
तमेवाहुरणुभ्योंअणुम तं महाद्भूयो महत्तरम
बहुधा सर्वभूतानि व्याज्य तिष्ठति शाश्वतं
क्षेत्रज्ञमेकत: कृत्वा सर्वे क्षेत्रमथैकत:
एवं संविमृशोज्ञIनि संयत: सततं हृदि
******************************************** ” नौ द्वार वाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियम पूर्वक निवास करता हैं….!. सब को वश में रखता हैं….!. सम्पूर्ण कोकों में चराचर प्राणियों का शासन करनेवाला ईश्वर भी वाही हैं ….!. उसे अणु से भी अणु और महान से भी महान कहते हैं…..!. वह नाना प्रकार के सभी प्राणियों को व्याप्त करके सदा स्थित रहता हैं….!. क्षेत्रज्ञ को एक ऑर करके दूसरी ऑर सम्पूर्ण क्षेत्र को पृथक करके रखे हैं….!. संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञiनि पुरुष सदा इस प्रकार अपने ह्रदय में विचार करता रहे - जड़ ऑर चेतन की पृथकता का विवेचन किया करे…..!
– श्रीमहाभारत अनुशासन पर्वाणि पञ्चशत्वारिशदथिकशततमो अध्याय: (via discoveryofhindustan)
(Source: krishna.com, via discoveryofhindustan)
नवद्वारम पुरम गत्वा सततं नियतो वशी
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च
तमेवाहुरणुभ्योंअणुम तं महाद्भूयो महत्तरम
बहुधा सर्वभूतानि व्याज्य तिष्ठति शाश्वतं
क्षेत्रज्ञमेकत: कृत्वा सर्वे क्षेत्रमथैकत:
एवं संविमृशोज्ञIनि संयत: सततं हृदि
******************************************** ” नौ द्वार वाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियम पूर्वक निवास करता हैं….!. सब को वश में रखता हैं….!. सम्पूर्ण कोकों में चराचर प्राणियों का शासन करनेवाला ईश्वर भी वाही हैं ….!. उसे अणु से भी अणु और महान से भी महान कहते हैं…..!. वह नाना प्रकार के सभी प्राणियों को व्याप्त करके सदा स्थित रहता हैं….!. क्षेत्रज्ञ को एक ऑर करके दूसरी ऑर सम्पूर्ण क्षेत्र को पृथक करके रखे हैं….!. संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञiनि पुरुष सदा इस प्रकार अपने ह्रदय में विचार करता रहे - जड़ ऑर चेतन की पृथकता का विवेचन किया करे…..!
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च
तमेवाहुरणुभ्योंअणुम तं महाद्भूयो महत्तरम
बहुधा सर्वभूतानि व्याज्य तिष्ठति शाश्वतं
क्षेत्रज्ञमेकत: कृत्वा सर्वे क्षेत्रमथैकत:
एवं संविमृशोज्ञIनि संयत: सततं हृदि
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– श्रीमहाभारत अनुशासन पर्वाणि पञ्चशत्वारिशदथिकशततमो अध्याय: (via discoveryofhindustan)
(Source: krishna.com, via discoveryofhindustan)



