"नवद्वारम पुरम गत्वा सततं नियतो वशी
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च
तमेवाहुरणुभ्योंअणुम तं महाद्भूयो महत्तरम
बहुधा सर्वभूतानि व्याज्य तिष्ठति शाश्वतं
क्षेत्रज्ञमेकत: कृत्वा सर्वे क्षेत्रमथैकत:
एवं संविमृशोज्ञIनि संयत: सततं हृदि
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” नौ द्वार वाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियम पूर्वक निवास करता हैं….!. सब को वश में रखता हैं….!. सम्पूर्ण कोकों में चराचर प्राणियों का शासन करनेवाला ईश्वर भी वाही हैं ….!. उसे अणु से भी अणु और महान से भी महान कहते हैं…..!. वह नाना प्रकार के सभी प्राणियों को व्याप्त करके सदा स्थित रहता हैं….!. क्षेत्रज्ञ को एक ऑर करके दूसरी ऑर सम्पूर्ण क्षेत्र को पृथक करके रखे हैं….!. संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञiनि पुरुष सदा इस प्रकार अपने ह्रदय में विचार करता रहे - जड़ ऑर चेतन की पृथकता का विवेचन किया करे…..!"
"सा हि सर्वेषु भूतेशु स्थावारेषु चरेषु च I
वासत्येको महावीर्यो नानाभावसमन्वित: II
नैव चोहर्वे न तिर्यक च नाधस्तान्न कदाचन I
इन्द्रियेरिः बुध्या व न दृश्येत कदाचन II
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नाना भावों से युक्त वह महापराक्रमी परमात्मा अकेला हि सम्पूर्ण चराचर भूतों में निवास करता हैं ….!. वह न ऊपर , न अगल- बगल में और न नीचे हि कभी दीखायी देता हैं….!. वह यहाँ इन्द्रियों अधवा बूढी के द्वारा कदापि दीखायी नहीं देता ……!."
"सा हि सर्वेषु भूतेशु स्थावारेषु चरेषु च
वासत्येको महावीर्यो नानाभावसमन्वित:
नैव चोहर्वे न तिर्यक च नाधस्तान्न कदाचन
इन्द्रियेरिः बुध्या व न दृश्येत कदाचन
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” नाना भावों से युक्त वह महापराक्रमी परमात्मा अकेला हि सम्पूर्ण चराचर भूतों में निवास करता हैं ….!. वह न ऊपर , न अगल- बगल में और न नीचे हि कभी दीखायी देता हैं….!. वह यहाँ इन्द्रियों अधवा बूढी के द्वारा कदापि दीखायी नहीं देता ……!.
नवद्वारम पुरम गत्वा सततं नियतो वशी
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च
तमेवाहुरणुभ्योंअणुम तं महाद्भूयो महत्तरम
बहुधा सर्वभूतानि व्याज्य तिष्ठति शाश्वतं
क्षेत्रज्ञमेकत: कृत्वा सर्वे क्षेत्रमथैकत:
एवं संविमृशोज्ञIनि संयत: सततं हृदि
” नौ द्वार वाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियम पूर्वक निवास करता हैं….!. सब को वश में रखता हैं….!. सम्पूर्ण कोकों में चराचर प्राणियों का शासन करनेवाला ईश्वर भी वाही हैं ….!. उसे अणु से भी अणु और महान से भी महान कहते हैं…..!. वह नाना प्रकार के सभी प्राणियों को व्याप्त करके सदा स्थित रहता हैं….!. क्षेत्रज्ञ को एक ऑर करके दूसरी ऑर सम्पूर्ण क्षेत्र को पृथक करके रखे हैं….!. संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञiनि पुरुष सदा इस प्रकार अपने ह्रदय में विचार करता रहे - जड़ ऑर चेतन की पृथकता का विवेचन किया करे…..!"
"अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येषमरमाश्रितम
यः पश्येत परमात्मानं बंधनैय: सा विमुच्यते
” जो सम्पूर्त्न मर्त्य शरीरों में अव्यक्त भाव से स्थित एवं अमर हैं, उस परमात्मा को जो देखता हैं , वह बंधनों से मुक्त हो जाता हैं…..!."
"अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येषमरमाश्रितम
यः पश्येत परमात्मानं बंधनैय: सा विमुच्यते
” जो सम्पूर्त्न मर्त्य शरीरों में अव्यक्त भाव से स्थित एवं अमर हैं, उस परमात्मा को जो देखता हैं , वह बंधनों से मुक्त हो जाता हैं…..!."
"MEN WHO ARE RESOLVED TO FIND A WAY FOR THEMSELVES WILL ALWAYS FIND OPPORTUNITIES ENOUGH; AND IF THEY DO NOT FIND THEM , THEY WILL MAKE THEM…..!."
"इश्क दी दहलीज़ ते
सिजदा करेगा जद कोई
याद फिर दहलीज़ नूं
मेरा ज़माना आएगा "
"I AM ENOUGH OF AN ARTIST TO DRAW FREELY UPON MY IMAGINATION….!. IMAGINATION IS MORE IMPORTANT THAN KNOWLEDGE …!. KNOWLEDGE IS LIMITED….!. IMAGINATION ENCIRCLES THE WORLD…….!"
" PRAYER IS NOT A ’ SPARE WHEEL ” THAT YOU PULL OUT WHEN IN TROUBLE, BUT IT’S A STEERING WHEEL THAT DIRECTS THE RIGHT PATH………!"
"FOR LAST YEAR’S WORDS BELONG TO LAST YEAR’S LANGUAGE;
AND NEXT YEAR’S WORDS AWAIT ANOTHER VOICE…..!.;
AND TO MAKE AN END IS TO MAKE A BEGINNING……!."
"SOMETIMES , NO MATTER HOW MUCH FAITH WE HAVE , WE LOSE PEOPLE….!. BUT YOU NEVER FORGET THEM ….!. AND SOME TIMES , IT’S THOSE MEMORIES THAT GIVE US THE FAITH TO GO ON……!."
"‘CHORDS THAT WERE BROKEN WILL VIBRATE ONCE MORE…..!"
"PEAK PERFORMERS DEVELOP POWERFUL MENTAL IMAGES OF THE BEHAVIOR, THAT WILL LEAD TO THE DESIRED RESULTS…!. THEY SEE IN THEIR MIND’S EYE THE RESULT THEY WANT, AND THE ACTIONS LEADING TO IT…….!."